मालवा के परमार
मालवा के प्रमारों के विषय में तो आपको मालूम ही है कि वह बहुत ही शक्ति संपन्न थे। जिसमें उज्जैन के राजा भर्तृहरि उसका भाई विक्रमादित्य ९ वी पीढ़ी में राजा भोज आदि हुए हैं ।जिनका विवरण पूर्व के लेखों में दिया जा चुका है । अतः पुनः दिया जाना आवश्यक नहीं है। परंतु यह विवरण दिया जाना आवश्यक है कि राजा भोज का पुत्र जयसिंह भी बहुत प्रतापी राजा था। जिसका सामंत बागड़ का राजा मंडलीक था । उसके चाचा उदयादित्य की लड़की श्यामा देवी का विवाह मेवाड़ के गुहिल वंश के राजा विजय सिंह के साथ हुआ था।( भेड़ाघाट का शिलालेख 12)
भेड़ाघाट के शिलालेख पेज 349 पर दिए विवरण के अनुसार जयसिंह के समय मालवा के पर मारो पर विजय सिद्धराज सोलंकी द्वारा हुई जिसके फलस्वरूप चित्तौड़ और बागड़ मालवा की भांति सिद्धराज के राज्य के भाग बन गए।
१३ वी शताब्दी में सोलंकी कमजोर हो चुके थे
प्रबंध चिंतामणि पृष्ठ 250 के अनुसार १३ वी शताब्दी के लगभग अर्जुन वर्मा नामक परमार ने सोलंकी ओं की कमजोरी का लाभ लेते हुए मालवा की अपनी राजधानी को पुनः प्राप्त कर लिया । अपने अधीन कर लिया अर्जुन वर्मा कवि, विद्वान और गायनविद्या में निपुण था।
इसी वंश में एक परमार राजा जैतुंग देव हुआ। जिसका युद्ध गुहिल वंश के राजा जैत्रासिंह से अर्थुना बांसवाड़ा में हुआ। इस युद्ध में परमार राजा जयचंद देव को गुहिल वंश के राजा से हार का सामना करना पड़ा ।
राजपूताना म्यूजियम रिपोर्ट अजमेर ,पृष्ठ – 1911-12 के अनुसार मालवा का सदियों का वैभव खिलजियों के कारण समाप्त हुआ और यहां के परमार भागकर अजमेर व बाद में कुछ बीकानेर में गए । इन्हीं के प्रसिद्ध वंशजों में महापा पंवार जो महाराणा कुंभा का समकालीन था व दूसरा करमचंद पंवार था , जो महाराणा संग्राम सिंह (महाराणा सांगा) का समकालीन था । ये अजमेर के आसपास छोटे-छोटे सामंत के रूप में रहते थे।
बागड़ के परमार
इनका संबंध भी मालवा के परमार वंश से ही है अर्थात इनकी उत्पत्ति भी मालवा के परमारों से ही है
मालवा के परमार कृष्णराज के दूसरे पुत्र डंबर सिंह के वंश से बागड़ के प्रमाण हैं । डूंगरपुर और बांसवाड़ा का भाग मिलकर के बागड़ कहा जाता है। जहां इनका राज्य होता था । राजा धनिक इनकी शाखा में दूसरे राजा थे । जिसका पोता कंकदेव मालवा के राजा श्रीहर्ष के शत्रु कर्णत से नर्मदा नदी तक लड़कर मारा गया था।
इसका पोता सतराज था जो गुजरात वालों से लड़ा। जिसकी पत्नी का नाम राजश्री था। जो चौहान वंश की थी (पानाहेड़ा का शिलालेख श्लोक 32)
इसका छोटा पुत्र मंडलीक मालवा के परमार भोज और जय सिंह का सामंत था। मंडलीक ने कन्ह नामक सेनापति को उसके हाथियों और घोड़ों सहित पकड़ कर जयसिंह के सुपुर्द कर दिया और अपने नाम से मंडलेश्वर का मंदिर 1059 ईस्वी में पाना हेड़ा में बनवाया था (राजपूताना म्यूजियम रिपोर्ट , अजमेर – 1916 -17 पृष्ठ 2 )
इस वंश का अंतिम शासक विजय राज बताया जाता है , क्योंकि उसके समय के 1108 और 1109 ईस्वी के दो शिलालेख मिलते हैं , लेकिन उसके बाद परमारों की इस शाखा का कोई महत्वपूर्ण शिलालेख नहीं मिला है।
इस विषय में कुछ इतिहासकारों का मत है कि 1179 ई0 में गोहिल राजा सामंत सिंह जब मेवाड़ छोड़कर इधर आया तो उसने गोहिल शाखा का राज्य यहाँ बागड़ में स्थापित कर दिया था। इस प्रकार यह बागड़ परमार शासकों के हाथ से निकल गया था।
राज जरूर समाप्त हो गया था बागड़ से, परंतु परमारों की जो राजधानी अर्थूना जिसका सही नाम उत्थुन्नक था , उसके अवशेष आज भी उसके वैभव की कहानी कहते हैं । उसके खंडहरों से ही पता चलता है कि अर्थूना उस समय बड़ा वैभवशाली नगर था।



Comments
Post a Comment