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महाराजा छत्रसाल

 महाराजा छत्रसाल






जन्म 4 मई 1649 या 3 जून 1649 या 17 जून 1648 ज्येष्ठ सुद तृतीया संवत 1706 

मृत्यु 20 दिसंबर 1731

छत्रसाल भारत के मध्ययुग के एक प्रतापी योद्धा थे जिन्होने मुगल शासक औरंगजेब से युद्ध करके बुन्देलखण्ड में अपना राज्य स्थापित किया और'महाराजा' की पदवी प्राप्त की।

बुंदेलखंड में कई प्रतापी शासक हुए हैं। बुंदेला राज्य की आधारिशला रखने वाले चंपतराय के पुत्र छत्रसाल महान शूरवीर और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल का जीवन मुगलों की सत्ता के खिलाफ संघर्ष और बुंदेलखंड की स्वतंत्रता स्थापित करने के लिए जूझते हुए निकला। महाराजा छत्रसाल अपने जीवन के अंतिम समय तक आक्रमणों से जूझते रहे।

बुंदेलखंड के शरीके नाम से विख्यात महाराजा छत्रसाल के बारे में ये पंक्तियां बहुत प्रभावशाली है !

इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस।

छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस॥

चंपतराय जब समय भूमि मे जीवन-मरण का संघर्ष झेल रहे थे उन्हीं दिनों ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत 1707 (सन 1641) को वर्तमान टीकमगढ़ जिले के लिघोरा विकास खंड के अंतर्गत ककर कचनाए ग्राम के पास स्थित विंध्य-वनों की मोर पहाड़ियों में इतिहास-पुरुष छत्रसाल का जन्म हुआ। अपने पराक्रमी पिता चंपतराय की मृत्यु के समय वे मात्र 12 वर्ष के ही थे। वनभूमि की गोद में जन्में, वनदेवों की छाया में पले, वनराज से इस वीर का उद्गम ही तोप, तलवार और रक्त प्रवाह के बीच हुआ। पांच वर्ष में ही इन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा हेतु अपने मामा साहेबसिंह धंधेर के पास देलवारा भेज दिया गया था। 

माता-पिता के निधन के कुछ समय पश्चात ही वे बड़े भाई अंगद राय के साथ देवगढ़ चले गये। बाद में अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या देवकुंअरि से विवाह किया। जिसने आंख खोलते ही सत्ता संपन्न दुश्मनों के कारण अपनी पारंपरिक जागीर छिनी पायी हो, निकटतम स्वजनों के विश्वासघात के कारण जिसके बहादुर मां-बाप ने आत्महत्या की हो, जिसके पास कोई सैन्य बल अथवा धनबल भी न हो, ऐसे 12-13 वर्षीय बालक की मनोदशा की क्या आप कल्पना कर सकते हैं ? परंतु उसके पास था बुंदेली शौर्य का संस्कार, बहादुर मां बाप का अदम्य साहस और ‘वीर वसुंधरा’ की गहरा आत्मविश्वास। इसलिए वह टूटा नहीं, डूबा नहीं, आत्मघात नहीं किया पर एक रास्ता निकाला। 

उसने अपने भाई के साथ पिता के दोस्त राजा जयसिंह के पास पहुंचकर सेना में भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया। राजा जयसिंह तो दिल्ली सल्तनत के लिए कार्य कर रहे थे अतःऔंरगजेब ने जब उन्हें दक्षिण विजय का कार्य सौंपा तो छत्रसाल को इसी युद्ध में अपनी बहादुरी दिखाने का पहला अवसर मिला। मइ्र 1665 में बीजापुर युद्ध में असाधारण वीरता छत्रसाल ने दिखायी और देवगढ़ (छिंदवाड़ा) के गोंडा राजा को पराजित करने में तो छत्रसाल ने जी-जान लगा दिया। इस सीमा तक कि यदि उनका घोड़ा, जिसे बाद में ‘भले भाई’ के नाम से विभूषित किया गया उनकी रक्षा न करता तो छत्रसाल शायद जीवित न बचते पर इतने पर भी जब विजय श्री का सेहरा उनके सिर पर न बांध मुगल भाई-भतीजे वाद में बंट गया तो छत्रसाल का स्वाभिमान आहत हुआ और उन्होंने मुगलों की बदनीयती समझ दिल्ली सल्तनत की सेना छोड़ दी।

इन दिनों राष्ट्रीयता के आकाश पर छत्रपति का सितारा चमचमा रहा था। छत्रसाल दुखी तो थे ही, उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज से मिलना ही इन परिस्थितियों में उचित समझा और सन 1668 में दोनों राष्ट्रवीरों की जब भेंट हुई तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियों का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी। बाजीराव प्रथम की पत्नी मस्तानी छत्रसाल की पुत्री थी।

करो देस के राज छतारे हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।

दौर देस मुगलन को मारोदपटि दिली के दल संहारो।

तुम हो महावीर मरदाने करि हो भूमि भोग हम जाने।

जो इतही तुमको हम राखेंतो सब सुयस हमारे भाषें।

शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर सन 1670 में छत्रसाल वापस अपनी मातृभूमि लौट आये परंतु तत्कालीन बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल मिन्न थीं। अधिकाश रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसाल के भाई-बंधु भी दिल्ली से भिड़ने को तैयार नहीं थे। स्वयं उनके हाथ में धन-संपत्ति कुछ था नहीं। दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया पर बादशाह से बैर न करने की ही सलाह दी। ओर छेश सुजान सिंह ने अभिषेक तो किया पर संघर्ष से अलग रहे। छत्रसाल के बड़े भाई रतनशाह ने साथ देना स्वीकार नहीं किया तब छत्रसाल ने राजाओं के बजाय जनोन्मुखी होकर अपना कार्य प्रारंभ किया। कहते हैं उनके बचपन के साथी महाबली तेली ने उनकी धरोहर, थोड़ी-सी पैत्रिक संपत्ति के रूप में वापस की जिससे छत्रसाल ने 5 घुड़सवार और 25 पैदलों की छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि.सं. 1728 (सन 1671) के शुभ मुहूर्त में औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापना का बीड़ा उठाया।

औरंगजेब से युद्ध : औरंगजेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। उसने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हजार सैनिकों की टुकडी मुगल सरदारों के साथ छत्रसाल का पीछा करने के लिए भेजी थी। छत्रसाल अपने रणकौशल व छापामार युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ाता रहा। छत्रसाल को मालूम था कि मुगल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुगल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी। छत्रसाल की शक्ति बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुगल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। बुन्देलखंड से मुगलों का एक छत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।

छत्रसाल का राज्याभिषेक : छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन प्राप्त था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने छत्रसाल को 'राजा' की मान्यता प्रदान की थी। उसके बाद छत्रसाल ने 'कालिंजर का क़िला' भी जीता और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में राजधानी स्थापित की। विक्रम संवत 1744 मे योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया था। छत्रसाल के शौर्य और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन, हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली का रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया था। मुराद ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे। 

छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ आजीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के संदेश देते रहे। उनके द्वारा दिये गये उपदेश 'कुलजम स्वरूप' में एकत्र किये गये। पन्ना में प्राणनाथ का समाधि स्थल है जो अनुयायियों का तीर्थ स्थल है। प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। किंवदन्ती है कि जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी वह धरा धनधान्य, रत्न संपन्न हो गयी। छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ गौरव के साथ दोहरायी जाती है !

इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोस 

छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौस।

छत्रसाल अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा। 1729 में मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, कौच, सेहुड़ा, सोपरी, जालोन पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, से हुड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। उनका पुत्र हृदयशाह भी उदासीन होकर अपनी जागीर में बैठा रहा। तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा !

जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आव

बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव !

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा और उसने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

साहित्य संरक्षक : छत्रसाल साहित्य के प्रेमी एवं संरक्षक थे। कई प्रसिद्ध कवि उनके दरबार में रहते थे।कवि भूषण उनमें से एक थे जिन्होने 'छत्रसाल दशक' लिखा है। इनके अलावा लाल कवि, बक्षी हंशराज आदि भी थे।

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 કહેવાય છે કે મહાદેવ એકાંત પ્રિય છે. ભોળાનાથ હંમેશા સ્મશાન કે વેરાન જગ્યાએ ધ્યાન મગ્ન રહેવાનું પસંદ કરે છે. આવી જ એક વેરાન જગ્યા કે જ્યાં થાય છે સ્વયંભૂ શિવલિંગ પર બારેમાસ અવિરત જળાભિષેક. તો આવો જાણીએ ક્યાં આવેલુ છે આ મંદિર . કોઈ સ્તોત્ર ન હોવા છતાં અવિરત પાણી ઝરવાનું શુ છે રહસ્ય? આજે આપણે વાત કરવાના છીએ ચોટીલાથી આશરે ૧૫ કિમિ દૂર થાનગઢ રોડ પર આવેલ પૌરાણિક સ્વયંભૂ મંદિર ઝરીયા મહાદેવની. આ મંદિર સુરેન્દ્રનગરથી અંદાજે ૬૮ કિમિ દૂર આ અલૌકિક મંદિર આવેલું છે. અહીં બારેમાસ શ્રદ્ધાળુઓ દર્શન માટે આવે છે.તેમાંય ખાસ શ્રાવણ મહિનામાં તો ભક્તોનો મેળાવડો જામે છે. અહીં બારેમાસ પથ્થરની એક શીલમાંથી અવિરત પાણી ઝરતું હોવાથી આ રમણીય મંદિરનું નામ ઝરીયા મહાદેવ પડ્યું હોવાનું મનાય છે. બારવર્ષના અજ્ઞાતવાસ દરમિયાન પાંડવોએ અહીંની પાવન ભૂમિ પર વસવાટ કર્યો હતો. એટલે પાંડવોના સમયનું આ મંદિર છે તેવું પણ માનવામાં આવે છે. મંદિરના ગર્ભગૃહમાં પથ્થરની એક મોટી શીલા નીચે સ્વયંભૂ મહાદેવ બિરાજમાન છે. શીલમાંથી ટપકતું પાણી આગળના એક કુંડમાં જમા થાય છે. જેને ભાવિકો પ્રસાદ તરીકે પીવે છે. ગુફામાં પ્રવેશતાની સાથે જાણે ઠંડુ બરફ જ...

એકતા • સેવા • સમર્પણ : સમાજ પ્રત્યેની આપણી જવાબદારી શું છે,

 આ પંક્તિઓ ખૂબ જ ઊંડી, પ્રેરણાદાયી અને સમાજ માટે અરીસો બતાવનારી છે. ​સમાજ પ્રત્યેની આપણી જવાબદારી શું છે, તે આ ચાર લીટીઓમાં ખૂબ જ સુંદર રીતે સમજાવવામાં આવ્યું છે: ​લડો સમાજ માટે: જો તમારામાં અન્યાય સામે લડવાની તાકાત હોય, તો આગળ આવીને લડો. ​લડી ના શકો તો બોલો: જો કોઈ કારણસર મેદાનમાં આવીને લડી ન શકો, તો અન્યાય સામે અવાજ ઉઠાવો, તમારો વિરોધ નોંધાવો. ​બોલી ના શકો તો લખો: જો અવાજ ઉઠાવવામાં પણ સંકોચ કે ડર હોય, તો તમારી કલમ ઉપાડો. લખાણ પણ મોટું પરિવર્તન લાવી શકે છે. ​હિંમત ના તોડો: અને જો તમે આ ત્રણેય વસ્તુ કરવા સક્ષમ નથી, તો કંઈ નહીં... પણ જે લોકો સમાજ સુધારવા માટે લડી રહ્યા છે, બોલી રહ્યા છે કે લખી રહ્યા છે, તેમની હિંમત ક્યારેય ન તોડો. તેમનો પગ ખેંચવાને બદલે તેમને સાથ આપો અથવા મૌન રહીને પણ તેમનું મનોબળ વધારો. ​એકતા, સેવા અને સમર્પણની ભાવના સાથેનો આ સંદેશ ખરેખર દરેક વ્યક્તિએ પોતાના જીવનમાં ઉતારવા જેવો છે. ખૂબ જ સુંદર વિચાર!