Skip to main content

महाराजा छत्रसाल

 महाराजा छत्रसाल






जन्म 4 मई 1649 या 3 जून 1649 या 17 जून 1648 ज्येष्ठ सुद तृतीया संवत 1706 

मृत्यु 20 दिसंबर 1731

छत्रसाल भारत के मध्ययुग के एक प्रतापी योद्धा थे जिन्होने मुगल शासक औरंगजेब से युद्ध करके बुन्देलखण्ड में अपना राज्य स्थापित किया और'महाराजा' की पदवी प्राप्त की।

बुंदेलखंड में कई प्रतापी शासक हुए हैं। बुंदेला राज्य की आधारिशला रखने वाले चंपतराय के पुत्र छत्रसाल महान शूरवीर और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल का जीवन मुगलों की सत्ता के खिलाफ संघर्ष और बुंदेलखंड की स्वतंत्रता स्थापित करने के लिए जूझते हुए निकला। महाराजा छत्रसाल अपने जीवन के अंतिम समय तक आक्रमणों से जूझते रहे।

बुंदेलखंड के शरीके नाम से विख्यात महाराजा छत्रसाल के बारे में ये पंक्तियां बहुत प्रभावशाली है !

इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस।

छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस॥

चंपतराय जब समय भूमि मे जीवन-मरण का संघर्ष झेल रहे थे उन्हीं दिनों ज्येष्ठ शुक्ल 3 संवत 1707 (सन 1641) को वर्तमान टीकमगढ़ जिले के लिघोरा विकास खंड के अंतर्गत ककर कचनाए ग्राम के पास स्थित विंध्य-वनों की मोर पहाड़ियों में इतिहास-पुरुष छत्रसाल का जन्म हुआ। अपने पराक्रमी पिता चंपतराय की मृत्यु के समय वे मात्र 12 वर्ष के ही थे। वनभूमि की गोद में जन्में, वनदेवों की छाया में पले, वनराज से इस वीर का उद्गम ही तोप, तलवार और रक्त प्रवाह के बीच हुआ। पांच वर्ष में ही इन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा हेतु अपने मामा साहेबसिंह धंधेर के पास देलवारा भेज दिया गया था। 

माता-पिता के निधन के कुछ समय पश्चात ही वे बड़े भाई अंगद राय के साथ देवगढ़ चले गये। बाद में अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या देवकुंअरि से विवाह किया। जिसने आंख खोलते ही सत्ता संपन्न दुश्मनों के कारण अपनी पारंपरिक जागीर छिनी पायी हो, निकटतम स्वजनों के विश्वासघात के कारण जिसके बहादुर मां-बाप ने आत्महत्या की हो, जिसके पास कोई सैन्य बल अथवा धनबल भी न हो, ऐसे 12-13 वर्षीय बालक की मनोदशा की क्या आप कल्पना कर सकते हैं ? परंतु उसके पास था बुंदेली शौर्य का संस्कार, बहादुर मां बाप का अदम्य साहस और ‘वीर वसुंधरा’ की गहरा आत्मविश्वास। इसलिए वह टूटा नहीं, डूबा नहीं, आत्मघात नहीं किया पर एक रास्ता निकाला। 

उसने अपने भाई के साथ पिता के दोस्त राजा जयसिंह के पास पहुंचकर सेना में भरती होकर आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया। राजा जयसिंह तो दिल्ली सल्तनत के लिए कार्य कर रहे थे अतःऔंरगजेब ने जब उन्हें दक्षिण विजय का कार्य सौंपा तो छत्रसाल को इसी युद्ध में अपनी बहादुरी दिखाने का पहला अवसर मिला। मइ्र 1665 में बीजापुर युद्ध में असाधारण वीरता छत्रसाल ने दिखायी और देवगढ़ (छिंदवाड़ा) के गोंडा राजा को पराजित करने में तो छत्रसाल ने जी-जान लगा दिया। इस सीमा तक कि यदि उनका घोड़ा, जिसे बाद में ‘भले भाई’ के नाम से विभूषित किया गया उनकी रक्षा न करता तो छत्रसाल शायद जीवित न बचते पर इतने पर भी जब विजय श्री का सेहरा उनके सिर पर न बांध मुगल भाई-भतीजे वाद में बंट गया तो छत्रसाल का स्वाभिमान आहत हुआ और उन्होंने मुगलों की बदनीयती समझ दिल्ली सल्तनत की सेना छोड़ दी।

इन दिनों राष्ट्रीयता के आकाश पर छत्रपति का सितारा चमचमा रहा था। छत्रसाल दुखी तो थे ही, उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज से मिलना ही इन परिस्थितियों में उचित समझा और सन 1668 में दोनों राष्ट्रवीरों की जब भेंट हुई तो छत्रपति शिवाजी महाराज ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियों का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी। बाजीराव प्रथम की पत्नी मस्तानी छत्रसाल की पुत्री थी।

करो देस के राज छतारे हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।

दौर देस मुगलन को मारोदपटि दिली के दल संहारो।

तुम हो महावीर मरदाने करि हो भूमि भोग हम जाने।

जो इतही तुमको हम राखेंतो सब सुयस हमारे भाषें।

शिवाजी से स्वराज का मंत्र लेकर सन 1670 में छत्रसाल वापस अपनी मातृभूमि लौट आये परंतु तत्कालीन बुंदेल भूमि की स्थितियां बिलकुल मिन्न थीं। अधिकाश रियासतदार मुगलों के मनसबदार थे, छत्रसाल के भाई-बंधु भी दिल्ली से भिड़ने को तैयार नहीं थे। स्वयं उनके हाथ में धन-संपत्ति कुछ था नहीं। दतिया नरेश शुभकरण ने छत्रसाल का सम्मान तो किया पर बादशाह से बैर न करने की ही सलाह दी। ओर छेश सुजान सिंह ने अभिषेक तो किया पर संघर्ष से अलग रहे। छत्रसाल के बड़े भाई रतनशाह ने साथ देना स्वीकार नहीं किया तब छत्रसाल ने राजाओं के बजाय जनोन्मुखी होकर अपना कार्य प्रारंभ किया। कहते हैं उनके बचपन के साथी महाबली तेली ने उनकी धरोहर, थोड़ी-सी पैत्रिक संपत्ति के रूप में वापस की जिससे छत्रसाल ने 5 घुड़सवार और 25 पैदलों की छोटी-सी सेना तैयार कर ज्येष्ठ सुदी पंचमी रविवार वि.सं. 1728 (सन 1671) के शुभ मुहूर्त में औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह का बिगुल बजाते हुए स्वराज्य स्थापना का बीड़ा उठाया।

औरंगजेब से युद्ध : औरंगजेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। उसने रणदूलह के नेतृत्व में 30 हजार सैनिकों की टुकडी मुगल सरदारों के साथ छत्रसाल का पीछा करने के लिए भेजी थी। छत्रसाल अपने रणकौशल व छापामार युद्ध नीति के बल पर मुगलों के छक्के छुड़ाता रहा। छत्रसाल को मालूम था कि मुगल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुगल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी। छत्रसाल की शक्ति बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुगल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। बुन्देलखंड से मुगलों का एक छत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।

छत्रसाल का राज्याभिषेक : छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन प्राप्त था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने छत्रसाल को 'राजा' की मान्यता प्रदान की थी। उसके बाद छत्रसाल ने 'कालिंजर का क़िला' भी जीता और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में राजधानी स्थापित की। विक्रम संवत 1744 मे योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया था। छत्रसाल के शौर्य और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन, हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली का रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया था। मुराद ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे। 

छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ आजीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के संदेश देते रहे। उनके द्वारा दिये गये उपदेश 'कुलजम स्वरूप' में एकत्र किये गये। पन्ना में प्राणनाथ का समाधि स्थल है जो अनुयायियों का तीर्थ स्थल है। प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। किंवदन्ती है कि जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी वह धरा धनधान्य, रत्न संपन्न हो गयी। छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ गौरव के साथ दोहरायी जाती है !

इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोस 

छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौस।

छत्रसाल अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा। 1729 में मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, कौच, सेहुड़ा, सोपरी, जालोन पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, से हुड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। उनका पुत्र हृदयशाह भी उदासीन होकर अपनी जागीर में बैठा रहा। तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा !

जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आव

बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव !

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा और उसने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

साहित्य संरक्षक : छत्रसाल साहित्य के प्रेमी एवं संरक्षक थे। कई प्रसिद्ध कवि उनके दरबार में रहते थे।कवि भूषण उनमें से एक थे जिन्होने 'छत्रसाल दशक' लिखा है। इनके अलावा लाल कवि, बक्षी हंशराज आदि भी थे।

Comments

Popular posts from this blog

EPFO ; Employees Provident Fund Organization

 इम्प्लॉई प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (EPFO) के लाभार्थियों के लिए एक अच्छी खबर सामने आई है। EPFO ने वित्त वर्ष 2021-22 के लिए इंटरेस्ट जमा करने की प्रोसेस शुरू कर दी है। जिसके बाद अब जल्द ही EPFO के 7 करोड़ सब्सक्राइबर्स के अकाउंट में इंटरेस्ट का पैसा रिफ्लेक्ट होना शुरू हो जाएगा। इस बात की जानकारी EPFO ने हाल ही में ट्वीट कर दी है। इसी साल मार्च में EPFO ने 8.1% इंटरेस्ट रेट का ऐलान किया था, जो पिछले 40 सालों में सबसे कम ब्याज दर है। इस खबर में हम आपको बताने जा रहे हैं कि आप किस तरह अपने PF अकाउंट में आए इंटरेस्ट को चेक कर सकते हैं। वेबसाइट पर कैसे चेक करें अपना अकाउंट बैलेंस ? सब्सक्राइबर सबसे पहले EPFO की ऑफिशियल वेबसाइट epfindia.gov.in पर जाएं। अब सर्विस टैब पर जाएं। यहां आपको 'For Employees' सर्च और सिलेक्ट करना है। यहां से आप नए पेज पर पहुंच जाएंगे, जहां आपको 'Member Passbook' पर क्लिक करना होगा। और इसके बाद (UAN) और पासवर्ड एंटर करना होगा। पासबुक ओपन होने के बाद उसमें एम्प्लायर कंट्रीब्यूशन, इंडिविजुअल कंट्रीब्यूशन और इंटरेस्ट दिखेगा। इम्प्लॉई जो एक से ज्यादा कं...

મહાન હિન્દુ સંત શ્રી જલારામ બાપા વિશે જાણવા જેવો ઈતિહાસ

 જન્મ- ૪ નવેમ્બર ૧૭૯૯ અવસાન – ૨૩ ફેબ્રુઆરી ૧૮૮૧ સંત શ્રી જલારામબાપાનો જન્મ ઇ.સ. વિક્રમ સંવત ૧૮૫૬ની કારતક સુદ સાતમે લોહાણા સમાજના ઠક્કર કુળમાં થયો હતો. તે ભગવાન રામના ભક્ત હતા. જલારામ બાપાને ગૃહસ્થ જીવન કે પોતાના પિતાનો વ્યવસાય સ્વીકરારવામાં કોઈ રસ નહોતો. તેઓ હંમેશા યાત્રાળુઓ, સંતો અને સાધુઓની સેવામાં રોકાયેલા રહેતા. તેઓ પોતાના પિતાથી છૂટા થઈ ગયા અને તેમના કાકા વાલજીભાઈએ યુવાન જલારામ અને તેમની માતાને પોતાને ઘેર રહેવા સૂચવ્યું. ૧૮૧૬ની સાલમાં ૧૬ વર્ષની ઊંમરે તેમના લગ્ન આટકોટના પ્રાગજીભાઈ ઠક્કરની પુત્રી વીરબાઈ સાથે કરવામાં આવ્યાં. વીરબાઈ પણ ધાર્મિક અને સંતઆત્મા હતા આથી તેમણે પણ જલારામ બાપા સાથે સંસારીવૃત્તિઓથી વિરક્ત રહી ગરીબો અને જરૂરિયાતમંદોની સેવાના કાર્યમાં ઝંપલાવી દીધું. વીસ વર્ષની વયે જલારામે આયોધ્યા, કાશી અને બદ્રીનાથની જાત્રાએ જવાનું નક્કી કર્યું ત્યારે પત્નિ વીરબાઈ પણ તેમની સાથે જોડાયા. ૧૮ વર્ષની ઉંમરે તેઓ ગુજરાતના ફતેહપુરના ભોજા ભગતના અનુયાયી બન્યા. ભોજા ભગતે તેમને “ગુરુ મંત્ર”, માળા અને શ્રી રામનું નામ આપ્યું. તેમના ગુરુના આશીર્વાદથી તેમણે ‘સદાવ્રત’ની શરૂઆત કરી. સદાવ...

केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी

 केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी " एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए।* *आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी। पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। र...

અક્ષૌહિણી સેના

પ્રાચીન ભારતમાં અક્ષૌહિણી એક સૈન્ય તરીકે ગણાય છે. મહાભારતના એ ધર્મયુદ્ધમાં અઢાર અક્ષૌહિણી સેનાનો નાશ થયો હતો. મહાભારતના યુધ્ધમાં સૈન્યમાં મનુષ્યોની સંખ્યા ઓછામાં ઓછી ૪૬૮૧૯૨૦ હતી  ઘોડાઓની સંખ્યા ૨૭૧૫૬૨૦ હતી  આમ્ર આય્લીજ સંખ્યામાં હાથીઓ હતાં  આ સંખ્યાથી તો એખ્યલ આવુજ ગયો હશે ને કે મહાભારતનું કુરુક્ષેત્રનું યુદ્ધ  કેટલું ભયંકર અને વિનાશકારી હતું ! મહાભારત મુજબ,  કુરુક્ષેત્રના યુદ્ધમાં કુલ ૧૮ અક્ષૌહિણી સેનાઓએ યુદ્ધમાં ભાગ લીધો હતો  આ પૈકી, ૧૧ અક્ષૌહિણી સેના કૌરવોના પક્ષમાં હતી  જ્યારે ૭ અક્ષૌહિણી સેના પંડવોની તરફેણમાં લડી હતી  અક્ષૌહિણી સેનામાં કેટલા રથ, હાથી, પાયદળ અને અને ઘોડા હોય છે  આના સંબંધમાં મહાભારતના પર્વસંગ્રાહના પર્વનાં દ્વિતીય અધ્યાયમાં આનું વિસ્તારપૂર્વક વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે  એ માહિતી આજે હું તમને આપવાં માંગુ છું   અક્ષૌહિણી સેના  " અક્ષૌહિણી હિ સેના સા તદા યૌધિષ્ઠીરં બલમ ।  પ્રવિશ્યાન્તદર્ઘે રાજન્સાગરં કુનદી યથા ॥  વિભાગ  કોઇપણ અક્ષૌહિણી સેના ગજ (હાથી સવાર)  રથ (રથી) ઘોડા (ઘો...

5 રાજ્યોની વિધાનસભા ચૂંટણીના પરિણામો LIVE

  યોગી અદિત્યનાથ વહેલી સવારે પહોંચ્યા મંદિર ઉત્તરપ્રદેશ સહિતના પાંચ રાજ્યોમાં આજે વિધાનસભા ચૂંટણીના પરિણામો, UP ના મુખ્યમંત્રી યોગી અદિત્યનાથ વહેલી સવારે મંદિર પહોંચ્યા નેતાઓ ભગવાનના શરણે  ઉત્તરપ્રદેશમાં મતગણતરી અગાઉ ભાજપ નેતા રાજેશ્વર સિંઘ ચંદ્રિકા દેવી મંદિરે દર્શનાર્થે પહોંચ્યા 5 states election results Infogram

રોજગાર સમાચાર 02.03.2022

 રોજગાર સમાચાર 02.03.2022 ડાયનોસોર પાર્ક ગુજરાત

શું તમે જાણો છો કે પાળિયા મુખત્વે ૧૧ પ્રકારના હોય છે, ચાલો આજે પાળિયા ના પ્રકારો વિષે થોડું જાણીયે

 1) ખાંભી: આ પ્રકારનો પાળીયો એટલે કે કોતરકામ વગર બાંધવામાં આવેલ કોઈ મૃત વ્યક્તિનું સ્મારક જેને આપણે ખાંભી તરીકે ઓળખીયે છીએ. 2) થેસા: એક એવો પ્રકાર છે જેમાં પાળિયાની નજીકમાં નાનાં પથ્થરો ગોઠવવામાં આવે છે જેને થેસા પણ કહે છે 3) ચાગીયો: કોઈ ઘટના કે વ્યક્તિના સંભારણા તરીકે નાના મોટા પત્થરોના ઢગલા કરી ને ચાગીયો બનાવવાં આવે છે, આ પ્રકારના પાળિયા બહુ ઓછા જોવા મળે છે. 4) સુરાપુરા: અન્યના જીવન માટે યુદ્ધમાં ખપી જનાર યોદ્ધાઓ જેને આપણે સૌ કોઈ સુરાપુરા તરીકે ઓળખીયે છીએ અને એમની યાદમાં સુરાપુરાના પાળિયા બને છે. 5) સુરધન: કોઈ આબરૂદાર અને શૂરવીર વ્યક્તિનું આકસ્મિક મૃત્યુ થાય ત્યારે આવા અકસ્માતની યાદમાં બાંધવામાં આવેલા પાળિયા ને સુરધન ના પાળિયા તરીકે વર્ગીકૃત કરવામાં આવે છે. તેમાંના કેટલાક પાળિયાને સતીમાતા અથવા ઝુઝાર મસ્તિષ્ક વગરનાં યોદ્ધાઓ પણ કહેવામાં આવે છે. 6) યોદ્ધાઓના પાળિયા: આ પ્રકારના સ્મારકો અથવા પાળિયા ઓ સૌથી સામાન્ય અને ઠેર ઠેર જોવા મળતા હોય છે, યોધ્ધાઓના પાળિયા મોટે ભાગે લડાઈના નાયકોની પૂજા કરતા લોક-સમુદાય અને લોકજાતિઓ સાથે સંકળાયેલ હોય છે. તેઓ મર્યાદિત વિસ્તારમાં એકી સાથે મોટી ...

जब एक किसान गंदे कपड़े पहन थाने पहुंचा, पूरा थाना हुआ सस्पेंड.....

सन् 1979 की बात है। शाम 6 बजे एक किसान इटावा ज़िला के ऊसराहार थाने में मैला कुचैला कुर्ता धोती पहने पहुँचा और अपने बैलों की चोरी की रिपोर्ट लिखाने की बात की। छोटे दरोग़ा ने पुलिसिया अंदाज में 4 आड़े-टेढ़े सवाल पूछे और रिपोर्ट बिना लिखे ही किसान को चलता किया। जब वो किसान थाने से जाने लगा तो एक सिपाही पीछे से आया और बोला “बाबा थोड़ा खर्चा-पानी दे तो रिपोर्ट लिख दी जाएगी।” अंत में 35 रूपये की रिश्वत लेकर रिपोर्ट लिखना तय हुआ। रिपोर्ट लिख कर मुंशी ने किसान से पूछा “बाबा हस्ताक्षर करोगे कि अंगूठा लगाओगे?” किसान ने हस्ताक्षर करने को कहा तो मुंशी ने दफ़्ती आगे बढ़ा दी जिस पर प्राथमिकी का ड्राफ़्ट लिखा था। किसान ने पेन के साथ अंगूठे वाला पैड उठाया तो मुंशी सोच में पड़ गया। हस्ताक्षर करेगा तो अंगूठा लगाने की स्याही का पैड क्यों उठा रहा है? किसान ने हस्ताक्षर में नाम लिखा #चौधरी_चरण_सिंह और मैले कुर्ते की जेब से मुहर निकाल के कागज पर ठोंक दी, जिस पर लिखा था “प्रधानमंत्री, भारत सरकार" ये देखकर सारे थाने में हड़कंप मच गया। असल में ये मैले कुर्ते वाले बाबा किसान नेता और भारत के उस समय ...

LIC :WhatsApp પર તમે ઉઠાવી શકશો એકસાથે 11 સર્વિસનો લાભ

 LIC દ્વારા આપવામાં આવેલી જાણકારી અનુસાર, જે પોલિસીધારકોએ પોતાની પોલિસીને ઓનલાઈન રજીસ્ટર્ડ નથી કરી તેઓ વોટ્સએપ પર તેનો લાભ લીધા પહેલા પોલિસીને એલઆઈસીની ઓફિશ્યલ સાઈટ પર જઈને રજીસ્ટર કરવાની રહેશે. એક વાત જે અહીં ધ્યાનમાં રાખવાની છે એ તે છે કે એલઆઈસીની પાસે તમારા રજીસ્ટર મોબાઈલ નંબરથી જ તમને વોટ્સએપ પર મેસેજ મોકલવાનો રહેશે.  LIC વોટ્સએપ નંબર: જુઓ નંબર અને સંપૂર્ણ પ્રોસેસ  સૌથી પહેલા તમારે તમારા ફોનમાં 8976862090 મોબાઈલ નંબર સેવ કરવો પડશે, જણાવી દઈએ કે આ LICનો ઓફિશિયલ વોટ્સએપ નંબર છે. ફોનમાં નંબર સેવ કર્યા પછી તમારે વોટ્સએપ ઓપન કરવું પડશે અને પછી વોટ્સએપમાં આ નંબર સાથે ચેટ બોક્સ ઓપન કરવું પડશે. ચેટ બોક્સ ખોલ્યા પછી, તમારે તેને Hi લખીને મોકલવાનું રહેશે. જેવુ તમે Hi લખીને મોકલશો, LICનો ચેટબોટ તમને સામેથી 11 વિકલ્પો મોકલશે. તમારે ફક્ત તે ઓપ્શન્સમાં જ સર્વિસ વિશે જાણકારી જોઈએ છે તેની આગળ જોવા મળી રહેલા ઓપ્શન નંબરને જોઈને મોકલવાના રહેશે. ઉદાહરણ તરીકે 1. પ્રીમિયમ ડેટ, 2. બોનસ સંબંધિત માહિતી. જો તમને પ્રીમિયમની તારીખ સંબંધિત માહિતી જોઈતી હોય તો તમારે 1 લખીને મોકલવાનું રહેશે. LIC પો...

પાંચાળ પ્રદેશ ઝાલાવાડનું એક પરગણું

  ઝાલાવાડનું એક પરગણું પાંચાળ પ્રદેશના નામે જૂના કાળથી જાણીતું છે. સુરેન્દ્રનગર જિલ્લામાં આવેલ થાનગઢ, ચોટિલા, મૂળીએ બધો વિસ્તાર પાંચાળ ગણાય છે. સ્કંદપુરાણ અને પદ્મપુરાણમાં પાંચાળનો ઉલ્લેખ મળે છે. સૂર્યદેવળને મધ્ય માનીને તેની પૂર્વે મૂખી-માંડવરાય (માર્તંડદેવ-સૂર્ય) પશ્ચિમે મહીકુ, ઉત્તરે સરામાથક અને દક્ષિણમાં ચોટિલા અને આણંદપર એમ ૧૯૬ માઈલના ધેરાવામાં આ પરગણું પથરાયેલું હતું. અહીંની પ્રજા એને ‘દેવકો પાંચાળ દેશ’ પણ કહે છે. શ્રી કનકાઇ માતાજી મંદિર : ગીર આ પંથકનું નામ પાંચાળ શાથી પડયું હશે એનું અનુમાન કરતાં માયાશંકર પંડયા નોંધે છે કે આ ભૂમિનું નામ કણ્વઋષિનાં વખતમાં પાંચાળ બોલાતું હતું તેમ જણાય છે. ‘થાનમહાત્મ્ય’ના બારમા અધ્યાયમાં આપેલ હકીકત મુજબ રામચંદ્રજીએ ગુરુ વશિષ્ટને પૂછ્યું, ‘હે મુનિવર! મેં રાવણાદિક રાક્ષસોને માર્યા એ વખતે અગસ્ત્ય ઋષિએ કહ્યું કે રાવણ તો વિપ્ર બ્રાહ્મણ હતો, એટલે તમને બ્રહ્મહત્યાનું પાપ લાગ્યું. પાપના નિવારણ અર્થે દેવભૂમિ પાંચાળમાં જાઓ. ત્યાં કણ્વ, ગાલવ, ઓતિથ્ય, અંગીરા અને ભ્રેસપતિ આદિ પાંચ ઋષિઓના તપથી પાવન થયેલી ભૂમિ છે. પાંચ ઋષિઓના વસવાટ પરથી આ પ્રદેશ પાંચાળ દેશન...