नई नीति का उद्देश्य 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% जीईआर के साथ पूर्व-विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के सार्वभौमिकरण का लक्ष्य एनईपी 2020 स्कूल से दूर रह रहे 2 करोड़ बच्चों को फिर से मुख्य धारा में लाएगा 12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की आंगनवाड़ी / प्री-स्कूलिंग के साथ नए 5 + 3 + 3 + 4 स्कूली पाठ्यक्रम पढ़ने-लिखने और गणना करने की बुनियादी योग्यता पर ज़ोर, स्कूलों में शैक्षणिक धाराओं,पाठ्येतर गतिविधियों और व्यावसायिक शिक्षा के बीच खास अंतर नहीं;इंटर्नशिप के साथ कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा शुरू कम से कम 5 वीं कक्षा तक मातृभाषा / क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई समग्र विकास कार्ड के साथ मूल्यांकन प्रक्रिया में पूरी तरह सुधार, सीखने की प्रक्रिया में छात्रों की प्रगति पर पूरी नज़र रखना उच्च शिक्षा में जीईआर को 2035 तक 50% तक बढ़ाया जाना;उच्च शिक्षा में 3.5 करोड़ नई सीटें जोड़ी जाएंगी उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में विषयों की विविधता होगी उपयुक्त प्रमाणीकरण के साथ पाठ्यक्रम के बीच मेंनामांकन / निकासकी अनुमति होगी
भारत में जो भी रह रहे हैं वे सभी ऋषि और मुनियों की संतानें हैं। चाहे वह सूर्यवंशी हो, असुरवंशी हो, चंद्रवंशी हो या अन्य किसी भी कुल से हो। ऋषियों में बहुत से ऐसे ऋषि थे जिन्होंने वेदों को संभालने के लिए वेदों के विभाग करने उन्हें अनेक शाखाओं में विभक्त करके सभी को अलग अलग वेद, शाखा आदि को कंठस्थ कराकर उन्हें यह शिक्षा दी की आप अपनी पढ़ियों को भी वेद की उक्त शाखा को कंठस्थ कराएं। इस तरह ब्राह्मण कुल के अलग अलग समाज का निर्माण होता गया। वर्तमान में यदि कोई जानकार अपना परिचय देगा तो अपना गोत्र, प्रवर, वेद, शाखा, शर्म, देवता, आवंटक आदि को बताना होगा। अब हम जानते हैं कि यह सब क्या होता है। 1.गोत्र : गोत्र का अर्थ है कि वह व्यक्ति किस ऋषि के कुल का है। जैसे किसी ने कहा कि मेरे गोत्र भारद्वाज है तो उसके कुल के ऋषि भारद्वाज हुए। अर्थात भारद्वाज के कुल से संबंध रखता है। भारद्वाज उसके कुल के आदि पुरुष है। इसी तरह कोई इंद्र, सूर्य या चंद्रदेव से तो कोई हिरण्याक्ष या हिरण्यकशिपु से संबंध रखता है तो कोई महान राजा बलि की संतान है। हालांकि सभी ऋषि अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश...
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