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प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर

 असम का कामाख्या मंदिर सदियों से पूज्नीय रहा है। आज भी यहां दुनिया भर से रोज़ाना हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। गुवाहाटी शहर की निलांचल पहाड़ियों पर स्थित ये मंदिर भारत में 51 शक्ति पीठों के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। कामाख्या देवी को समर्पित ये मंदिर शक्ति और तंत्र पूजा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि ये मंदिर क्यों अनोखा है? इस मंदिर में न तो कोई मूर्ति है और न ही किसी देवी की आकृति है, यहां बस पत्थर में तराशा हुआ योनि का एक प्रतिरूप है जिसकी श्रद्धालु पूजा करते हैं।



असम के प्रारंभिक इतिहास में कामाख्या देवी नाम प्रधान नामों से से एक है। कामाख्या कामरुप अथवा प्राचीन असम की अधिष्ठातृ देवी थी। इस वजह से इसे कामरुप-कामाख्या भी कहा जाता है। माना जाता है कि कामाख्या इस प्रांत के आदिवासियों की माता देवी हुआ करती थीं। माता देवी की पूजा करने वाले संप्रदाय का संबंध खासी और गारो जैसी मातृस्वामिक जानजातियों से है जो नीलांचल पहाड़ियों में रहती थीं।

कुछ प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अनुसार, कामाख्या काली का रुप है। अन्य ग्रंथों में कामाख्या को शिव की पत्नी शक्ति का भी रुप माना जाता है। शक्ति और तंत्र की पूजा करने वाले संप्रदाय के लिये कामाख्या का हमेशा से एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। असम में, जिसे पहले प्राग्ज्युतिषपुर और बाद में कामरुप के नाम से भी जाना जाता था, तंत्र-पूजा का लंबा इतिहास रहा है। कहा तो यहां तक जाता है कि तंत्र पूजा की शुरुआत ही असम प्रांत में हुई थी।


प्राग्ज्युतिषपुर या कामरुप के प्राचीन क्षेत्र मौजूदा समय के असम की सीमा से कहीं आगे पश्चिम में करातोया नदी के तट ( आज के उत्तर-पश्चिमी बंगाल) उत्तर में हिमालय पीठगिरी, पूर्व में लोहित मैदान और निचले असम से लगे कुछ हिस्सों तक फैले हुए थे। असम के ये निचले हिस्से अब बांग्लादेश में हैं।


साहित्य से पता चलता है कि कामरुप के ज़्यादातर राजा तंत्र विधा में विश्वास करते थे। इसके अलावा कामरुप साम्राज्य में पाल राजवंश की स्थापना करने वाले ब्रह्मपाल (900-920) के बाद शायद प्राचीन असम के शासकों ने तंत्र विधा को अपना सिद्धांत बनाया था और इस शाही संरक्षण की वजह से कामाख्या तांत्रिक बलिदान तथा रहस्यवाद का एक प्रमुख केंद्र बन गया।


कामाख्या मंदिर के मूल निर्माण का उल्लेख इतिहास में नहीं मिलता और कोई ऐसा रिकॉर्ड भी नही है जिससे पता चल सके कि मूल कामाख्या मंदिर कब बना था। लेकिन मंदिर और देवी को लेकर कई किवदंतियां और लोक कथाएं हैं। प्राचीन ग्रंथ कालिका पुराण के अनुसार शिव की पत्नी सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। उसके पिता दक्ष (ब्रह्मा के पुत्र) ने सती के पति का अपमान किया था और इससे सती नाराज़ थी। सती के आत्मदाह से शिव बहुत दुखी थे। उन्होंने सती का शव लेकर पृथ्वी की परिक्रमा की। कहा जाता है कि शिव विश्व का नाश करने के लिये तांडव नृत्य करने लगे थे और इसे रोकने के लिये भागवान विष्णु ने सती के शव के 51 टुकड़े कर दिये। लोककथा के अनुसार जिस-जिस जगह पर माता सती के शरीर के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बन गए। कहा जाता है कि नीलांचल पर्वत पर सती का योनि भाग गिरा था। कालिका पुराण के अनुसार नीलांचल पर्वत शिव के शरीर का प्रतिनिधित्व करता है और जब सती की योनि पर्वत पर गिरी तो उसका रंग नीला हो गया और तभी इसका नाम नीला पर्वत यानी नीलांचल पड़ गया। लोगों का विश्वास है कि गुफा की तरह दिखने वाला मंदिर का गर्भगृह माता देवी कामाख्या की कोख की तरह है। दिलचस्प बात ये है कि मंदिर के एक प्राकृतिक जल स्रोत की वजह से माता देवी की छवि या पवित्र योनि हमेशा नम रहती है।

मंदिर निर्माण से एक किवदंती जुड़ी हुई है। इसके अनुसार कामाख्या मंदिर का निर्माण नरक नामक राजा ने करवाया था। पहले असुर राजा नरक बहुत विनम्र था और कामाख्या देवी की पूजा करता था। लेकिन तेज़पुर के बोड़ो राजा बाना असुर के बहकावे में आकर वह नास्तिक हो गया और उसने कामाख्या के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। कामाख्या देवी इस शर्त पर शादी करने पर तैयार हुई कि एक ही रात में नीलांचल पर्वत पर उसके नाम का एक मंदिर, एक तालाब और मंदिर तक एक सड़क बनाई जाए। नरक असुर सहमत हो गया और उसने ये काम लगभग पूरे भी कर दिए थे कि देवी कामाख्या ने रात ख़त्म होने से पहले ही मुर्ग़े से सुबह की बांग दिलवा दी और फिर उन्होंने शादी से इंकार कर दिया। कहा जाता है कि कामाख्या मंदिर इसी तरह बना था। भारत में अंगरेज़ों के शासनकाल में बंगाल सूबे में बिहार और उड़ीसा के लेफ़्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गैट ने अपनी किताब “ए हिस्ट्री ऑफ़ असम (1905)” में लिखा है कि ये काफ़ी संभव है कि नरक कोई काल्पनिक चरित्र न होकर वास्तव में कोई शक्तिशाली राजा होगा जो असम के ज़्यादातार हिस्सों पर शासन करता होगा। ये भी कहा जाता है कि नरक का पुत्र कामरुप का राजा बना और उसके बाद सलास्तंभ पाल राजा बने जिन्होंने चौथी सदी से कामरुप पर शासन किया था। लेकिन नरक द्वारा मंदिर निर्माण की कहानी सिर्फ एक किवदंती ही है।


कुछ विद्वानों का मानना है कि मूल कामाख्या मंदिर का निर्माण चौथी-पांचवीं सदी के आसपास हुआ था जबकि कुछ का मत है कि ये 7वी-8वीं के दौरान बना था। लेकिन हमें मंदिर का मौजूदा इतिहास कोच राजाओं के समय के बाद से ही मिलता है। कोच राजवंश ने सन 1515 से लेकर सन 1635 तक असम पर शासन किया था और राजा विश्व सिंह पहले कोच राजा थे। कहा जाता है कि विश्व सिंह ने सन 1553 में कामाख्या मंदिर दोबारा बनवाया था। वह हिंदु धर्म के संरक्षक थे और शिव तथा दुर्गा का उपासक थे। उन्होंने कामाख्या की पूजा दोबारा शुरु करवाई थी और कहा जाता है कि उन्होंने कामाख्या देवी की पूजा के लिये बनारस (उत्तर प्रदेश ) से ब्राह्मणों को बुलवाया था।


माना जाता है कि बंगाल के मुग़ल सूबेदार सुल्तान सुलैमान कर्रानी के एक मुस्लिम जनरल काला पहाड़ ने सन 1568 में कई मंदिरों के साथ साथ कामाख्या मंदिर भी तुड़वा दिया था हालंकि गुवाहाटी पर काला पहाड़ के आक्रमण और उसके कृत्यों का इतिहास में कोई साक्ष नहीं मिलता है। लेकिन कुछ विद्वानों का मानना है कि मंदिर को काला पहाड़ ने नहीं बल्कि बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह ने तुड़वाया था जिसने सन 1499-1502 के दौरान इस क्षेत्र पर आक्रमण किया था। अलाउद्दीन हुसैन शाह ने हुसैन शाही राजवंश की स्थापना की थी।

मंदिर के एक शिला-लेख के अनुसार कामाख्या मंदिर का पुनर्निर्माण राजा विशव सिंह के पुत्र राजा नर नारायण ने करवाया था। मंदिर का निर्माण कार्य सन 1565 में पूरा हुआ था। नर नारायण ने ब्राह्मणवादी रीति-रिवाजों के अनुसार हर दिन पूजापाठ का भी इंतज़ाम किया था। उसने मंदिर में पूजा तथा अर्चना के लिये अलग अलग शहरों से पुजारी बुलवाए थे।


सन 1658 के अंत तक अहोम शासकों ने कामरुप क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था और मंदिर पर उनका नियंत्रण हो गया।अहोम राजा शैव अथवा शक्ति संप्रदाय के मानने वाले थे और उन्होंने मंदिर को कई बार बनवाया और सजाया था।

सन 1897 में शिलोंग पठार से असम और आसापस के इलाक़ों में एक ज़बरदस्त भूकंप आया था। भूकंप में कामाख्या सहित अन्य कई प्राचीन भवनों को काफ़ी क्षति हुई लेकिन बाद में मंदिर को फिर बनवा दिया गया।


मौजूदा कामाख्या मंदिर के चार प्रमुख हिस्से हैं-विमाना, चलंत, पंचरत्न और नटमंदिर। विमाना मंदिर के सबसे प्रमुख हिस्से गर्भगृह के ऊपर है जिसमें पीठ स्थान है। गर्भगृह और पंचरत्न के बीच चलंत है। इस हिस्से की छत पत्थर के बारह खंबों पर टिकी है जो मध्य में हैं। ये खंबे आयताकर पैटर्न में खड़े हैं।


मंदिर का अंतिम हिस्सा नटमंदिर है जो अहोम राजवंश के राजा राजेश्वर सिंह ने सन 1759 में बनवाया था। नटमंदिर की दीवारों पर राजेश्वर सिंह और राजा गुरुनाथ सिंह (1782) के शिला-लेख हैं।


मंदिर की वास्तुकला एक अलग तरह की है जिसे नीलांचल शैली कहा गया, जो असम के अहोम राजाओं में बहुत लोकप्रिय थी। कहा जाता है कि कोच कारीगर मेघमुकदम ने मंदिर का मौजूदा अर्धगोलाकार शिखर बनाया था जो रथ के ऊपर है।


कामाख्या मंदिर कई तरह की मूर्तियों के लिये भी प्रसिद्ध है। ज़्यादातर मूर्तियां ग्रेनाइट के पत्थरों को तराशकर बनाईं गईं हैं। इनमें विष्णु, शिव, गणेश और भैरव (शिव का एक तांत्रिक रुप) की मूर्तियां शामिल हैं। इन मूर्तियों के अलावा मंदिर में यौद्धाओं और जानवरों की भी मूर्तियां हैं। इसके अलावा वे भी मूर्तियां हैं जिनमें सामान्य जनजीवन दर्शाया गया है। पहाड़ियों पर पुरातत्विदों को मूर्तियों के टुकड़े मिले हैं। मंदिर और इसके आसपास देवियों की भी कई मूर्तियां हैं।



मुख्य कामाख्या मंदिर के अलावा परिसर में दशमहाविद्या मंदिर भी हैं। ये मंदिर शक्ति के दस महाविद्या (पार्वती के रुप) काली, तारा, सोदाशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, चिन्नमस्त, धुमवती, बगलमुखी, मतंगी और कमलतिका को समर्पित हैं। मंदिर में कई त्यौहार मनाये जाते हैं लेकिन अंबुवाची मेला और दुर्गा पूजा सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। अंबुवाची त्यौहार तीन दिन तक चलता है जो हर साल जून-जुलाई के माह में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये त्यौहार कामाख्या देवी के रजस्वला होने पर मनाया जाता है। इस दौरान एक बड़े मेले का आयोजन होता है जिसमें बड़ी संख्या योगी, भिक्षु और श्रद्धालु आते हैं। .


कामाख्या मंदिर का असम के इतिहास से एक लंबा नाता है और ये माता देवी की उपासना करने वाले संप्रदाय की एक समृद्ध विरासत है। ये मंदिर आज भी एक शक्तिशाली आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।



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 શીખ ધર્મમાં એક કરતા વધુ યોદ્ધાઓ થયા છે, પરંતુ આ યોદ્ધાઓમાં એક એવો યોદ્ધા હતો, જેની સામે મુઘલોમાંથી એક પણ આગળ નહોતું ગયું. આ બહાદુર યોદ્ધાનું નામ બંદા સિંહ બહાદુર છે. તેઓ ભારતમાં મુઘલ શાસકો સામે યુદ્ધ કરનાર પ્રથમ શીખ લશ્કરી વડા હતા. બંદા સિંહે જ મુઘલોના અજેય હોવાનો ભ્રમ તોડ્યો અને નાના સાહિબજાદાઓની શહાદતનો બદલો લીધો. બંદા સિંહ બહાદુરે હથિયાર અને સેના વિના 2500 કિમીની મુસાફરી કર્યા પછી 20 મહિનાની અંદર સરહિંદ પર કબજો કરીને ‘ખાલસા રાજ’ની સ્થાપના કરી હતી. ગુરુ ગોવિંદ સિંહ સાથે મુલાકાત બંદા સિંહ બહાદુરનો જન્મ 27 ઓક્ટોબર 1670ના રોજ જમ્મુ અને કાશ્મીરના રાજૌરીના એક રાજપૂત પરિવારમાં થયો હતો. તેમનું બાળપણનું નામ લક્ષ્મણ દેવ હતું. 15 વર્ષની ઉંમરે તેઓ ઘર છોડીને બૈરાગી બન્યા અને તેઓ માધોદાસ બૈરાગી તરીકે ઓળખાવા લાગ્યા. ઘર છોડ્યા પછી, તેમણે દેશનો પ્રવાસ કર્યો અને મહારાષ્ટ્રમાં નાંદેડ પહોંચ્યા જ્યાં 1708 માં તેઓ શીખોના 10મા ગુરુ ગુરુ ગોવિંદ સિંહને મળ્યા. આ દરમિયાન ગુરુ ગોવિંદ સિંહજીએ તેમને તેમની તપસ્વી જીવનશૈલી છોડી દેવા અને પંજાબના લોકોને મુઘલોથી મુક્તિ અપાવવાનું કાર્ય સોંપ્યું. આ પછી, ગુરુ ગોવિં...

જોગીદાસ ખુમાણ

  બાપુ! ગઝબ થઈ ગયો.” જોગીદાસે બહારવટે રઝળતાં રઝળતાં એક દિવસ મીતીઆળાના ડુંગરામાં પોતાના બાપ હાદા ખુમાણને શોકના સમાચાર સંભળાવ્યા.  “શું થયું આપા ?" “મહારાજ વજેસંગનો કુંવર દાદભા ગુજરી ગયા.” “અરરર ! દાદભા જેવો દીકરો ઝડપાઈ ગયો ? શું થયું ? ઓચીંતાનો કાળ ક્યાંથી આવ્યો ?” “ભાવનગરની શેરીએ શેરીએ ભમીને મેં કાનોકાન વાત સાંભળી કે શિહોરથી દશેરાને દિ' નાનલબા રાણીએ કુંવરને ભાવનગર દરિયો પૂજવા બોલાવ્યા, અને કુંવર દરિયો પૂજીને પાછા વળ્યા ત્યારે નાનલબાએ મંત્રેલ અડદને દાણે વધાવીને કાંઇક કામણ કર્યું : કુંવરનું માથું ફાટવા માંડ્યું. શિહોર ભેળા થયા ત્યાં તો જીભ ઝલાઈ ગઈ ને દમ નીકળી ગયો.” “કોપ થયો. મહારાજને માથે આધેડ અવસ્થાએ વીજળી પડ્યા જેવું થયું આપા !” “વીજળી પડ્યાની તો શું વાત કરૂં બાપુ ! શિહોર ભાવનગરની શેરીએ શેરીએ છાતીફાટ વિલાપ થાય છે. વસ્તીના ઘરેઘરમાં પચીસ વરસનો જુવાન જોદ્ધો મરી ગયો હોય એવો કળેળાટ થાય છે.” “આપા ! બાપ ! દાદભાની દેઈ પડે એનું સનાન તો આપણને ય આવ્યું કે'વાય. આપણે ના'વું જોવે.” સહુ બહારવટીયાઓએ ફાળીયાં પહેરીને નદીમાં માથાબોળ સ્નાન કર્યું. પછી જુવાન જોગીદાસે વાત ઉચ્ચારી: “બાપુ...