Skip to main content

RSS : संघ वटवृक्ष के बीज – डॉक्टर हेडगेवार

 



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज सर्वत्र चर्चा में है. संघ कार्य का बढ़ता व्याप देख कर संघ विचार के विरोधक चिंतित होकर संघ का नाम बार-बार उछाल रहे हैं. अपनी सारी शक्ति और युक्ति लगाकर संघ विचार का विरोध करने के बावजूद यह राष्ट्रीय शक्ति क्षीण होने के बजाय बढ़ रही है, यह उनकी चिंता और उद्वेग का कारण है. दूसरी ओर राष्ट्रहित में सोचने वाली सज्जन शक्ति संघ का बढ़ता प्रभाव एवं व्याप देख कर भारत के भविष्य के बारे में अधिक आश्वस्त होकर संघ के साथ या उसके सहयोग से किसी ना किसी सामाजिक कार्य में सक्रिय होने के लिए उत्सुक हैं, यह देखने में आ रहा है. संघ की वेबसाइट पर ही संघ से जुड़ने की उत्सुकता जताने वाले युवकों की संख्या 2012 में प्रतिमास 1000 थी. यही संख्या प्रतिमास 2013 में 2500 और 2014 में 9000 थी. इस से ही संघ के बढ़ते समर्थन का अंदाज लगाया जा सकता है. संघ की इस बढती शक्ति का कारण शाश्वत सत्य पर आधारित संघ का शुद्ध राष्ट्रीय विचार एवं इसके लिए तन–मन–धन पूर्वक कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की अखंड श्रृंखला है.


संघ का यह विशाल वटवृक्ष एक तरफ नई आकाशीय ऊंचाइयां छूता दिखता है, वहीँ उसकी अनेक जटाएं धरती में जाकर इस विशाल विस्तार के लिए रस पोषण करने हेतु नई-नई जमीन तलाश रही हैं, तैयार कर रही हैं. इस सुदृढ़, विस्तृत और विशाल वटवृक्ष का बीज कितना पुष्ट एवं शुद्ध होगा इसकी कल्पना से ही मन रोमांचित हो उठता है. इस संघ वृक्ष के बीज संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार, जिनके जन्म को इस वर्ष प्रतिपदा पर 125 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं. कैसा था यह बीज?

नागपुर में वर्ष प्रतिपदा के पावन दिन 1 अप्रैल, 1889 को जन्मे केशव हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे. आजादी के आन्दोलन की आहट भी मध्य प्रान्त के नागपुर में सुनाई नहीं दी थी और केशव के घर में राजकीय आन्दोलन की ऐसी कोई परंपरा भी नहीं थी, तब भी शिशु केशव के मन में अपने देश को गुलाम बनाने वाले अंग्रेज के बारे में गुस्सा तथा स्वतंत्र होने की अदम्य इच्छा थी, ऐसा उनके बचपन के अनेक प्रसंगों से ध्यान में आता है. रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के हीरक महोत्सव के निमित्त विद्यालय में बांटी मिठाई को केशव द्वारा (उम्र 8 साल) कूड़े में फेंक देना या जॉर्ज पंचम के भारत आगमन पर सरकारी भवनों पर की गई रोशनी और आतिशबाजी देखने जाने के लिए केशव (उम्र 9 साल) का मना करना ऐसे कई उदहारण हैं.

बंग-भंग विरोधी आन्दोलन का दमन करने हेतु वन्देमातरम के प्रकट उद्घोष करने पर लगी पाबन्दी करने वाले रिस्ले सर्क्युलर की धज्जियाँ उड़ाते हुए 1907 में विद्यालय निरीक्षक के स्वागत में प्रत्येक कक्षा में वन्देमातरम का उद्घोष करवा कर, उनका स्वागत करने की योजना केशव की ही थी. इसके माध्यम से अपनी निर्भयता, देशभक्ति तथा संगठन कुशलता का परिचय  केशव ने सबको कराया. वैद्यकीय शिक्षा की सुविधा मुंबई में होते हुए भी क्रन्तिकारी आंदोलन का प्रमुख केंद्र होने के कारण कोलकाता जाकर वैद्यकीय शिक्षा प्राप्त करने का उन्होंने निर्णय लिया और शीघ्र ही क्रान्तिकारी आन्दोलन की शीर्ष संस्था अनुशीलन समिति के अत्यंत अंतर्गत मंडली में उन्होंने अपना स्थान पा लिया. 1916 में नागपुर वापिस आने पर घर की आर्थिक दुरावस्था होते हुए भी, डॉक्टर बनने के बाद अपना व्यवसाय या व्यक्तिगत जीवन – विवाह आदि करने का विचार त्याग कर पूर्ण शक्ति के साथ स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होंने अपने आप को झोंक दिया. 

1920 में नागपुर में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन की व्यवस्था के प्रबंधन की जिम्मेदारी डॉक्टर जी के पास थी. इस हेतु उन्होंने 1200 स्वयंसेवकों की भरती की थी. कांग्रेस की प्रस्ताव समिति के सामने उन्होंने दो प्रस्ताव रखे थे. भारत के लिए पूर्ण स्वतंत्रता और विश्व को पूँजीवाद के चंगुल से मुक्त करना, यह कांग्रेस का लक्ष्य होना चाहिए. पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव कांग्रेस ने संघ स्थापना के बाद 1930 में स्वीकार कर पारित किया, इसलिए डॉक्टर जी ने संघ की सभी शाखाओं पर कांग्रेस का अभिनन्दन करने का कार्यक्रम करने के लिए सूचना दी थी. इससे डॉक्टर जी की दूरगामी एवं विश्वव्यापी दृष्टि का परिचय होता है.  

व्यक्तिगत मतभिन्नता होने पर भी साम्राज्य विरोधी आन्दोलन में सभी ने साथ रहना चाहिए. और यह आन्दोलन कमजोर नहीं होने देना चाहिए ऐसा वे सोचते थे. इस सोच के कारण ही खिलाफत आन्दोलन को कांग्रेस का समर्थन देने की महात्मा गाँधी जी की घोषणा का विरोध होने के बावजूद उन्होंने अपनी नाराजगी खुलकर प्रकट नहीं की तथा गांधीजी के नेतृत्व में असहयोग आन्दोलन में वे बेहिचक सहभागी हुए.

स्वतंत्रता प्राप्त करना किसी भी समाज के लिए अत्यंत आवश्यक एवं स्वाभिमान का विषय है किन्तु वह चिरस्थायी रहे तथा समाज आने वाले सभी संकटों का सफलतापूर्वक सामना कर सके, इसलिए राष्ट्रीय गुणों से युक्त और सम्पूर्ण दोषमुक्त, विजय की आकांक्षा तथा विश्वास रख कर पुरुषार्थ करने वाला, स्वाभिमानी, सुसंगठित समाज का निर्माण करना अधिक आवश्यक एवं मूलभूत कार्य है. यह सोच कर डॉक्टर जी ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. प्रखर ध्येयनिष्ठा, असीम आत्मीयता और अपने आचरण के उदाहरण से युवकों को जोड़ कर उन्हें गढ़ने का कार्य शाखा के माध्यम से शुरू हुआ. शक्ति की उपासना, सामूहिकता, अनुशासन, देशभक्ति, राष्ट्रगौरव तथा सम्पूर्ण समाज के लिए आत्मीयता और समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से त्याग करने की प्रेरणा इन गुणों के निर्माण हेतु अनेक कार्यक्रमों की योजना शाखा नामक अमोघ तंत्र में विकसित होती गयी. सारे भारत में प्रवास करते हुए अथक परिश्रम से केवल 15 वर्षमें ही आसेतु हिमालय, सम्पूर्ण भारत में संघ कार्य का विस्तार करने में वे सफल हुए.

अपनी प्राचीन संस्कृति एवं परम्पराओं के प्रति अपार श्रद्धा तथा विश्वास रखते हुए भी आवश्यक सामूहिक गुणों की निर्मिती हेतु आधुनिक साधनों का उपयोग करने में उन्हें जरा सी भी हिचक नहीं थी.अपने आप को पीछे रखकर अपने सहयोगियों को आगे करना, सारा श्रेय उन्हें  देने की उनकी संगठन शैली के कारण ही संघ कार्य की नींव मजबूत बनी.

संघ कार्य आरंभ होने के बाद भी स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए समाज में चलने वाले   तत्कालीन सभी आंदोलनों के साथ न केवल उनका संपर्क था, बल्कि उसमें समय-समय पर वे व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ सहभागी भी होते थे. 1930 में गांधीजी के नेतृत्व में शुरू हुए सविनय कानून भंग आन्दोलन में सहभागी होने के लिए उन्होंने विदर्भ में जंगल सत्याग्रह में व्यक्तिगत तौर पर स्वयंसेवकों के साथ भाग लिया तथा 9 मास का कारावास भी सहन किया. इस समय भी व्यक्ति निर्माण एवं समाज संगठन का नित्य कार्य अविरत चलता रहे, इस हेतु उन्होंने अपने मित्र एवं सहकारी डॉ. परांजपे को सरसंघचालक पद का दायित्व सौंपा था तथा संघ शाखाओं पर प्रवास करने हेतु कार्यकर्ताओं की योजना भीकी थी. उस समय समाज कांग्रेस–क्रान्तिकारी, तिलकवादी–गाँधीवादी, कांग्रेस–हिन्दु महासभा ऐसे द्वंद्वों में बंटा हुआ था. डॉक्टर जी इस द्वंद्व में ना फंस कर, सभी से समान नजदीकी रखते हुए कुशल नाविक की तरह संघ की नाव को चला रहे थे.

संघ को समाज में एक संगठन न बनने देने की विशेष सावधानी रखते हुए उन्होंने संघ को सम्पूर्ण समाज का संगठन के नाते ही विकसित किया. संघ कार्य को सम्पूर्ण स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्होंने बाहर से आर्थिक सहायता लेने की परंपरा नहीं रखी. संघ के घटक, स्वयंसेवक ही कार्य के लिए आवश्यक सभी धन, समय, परिश्रम, त्याग देने हेतु तत्पर हो, इस हेतु गुरु दक्षिणा की अभिनव परंपरा संघ में शुरू की. इस चिरपुरातन एवं नित्यनूतन हिन्दू समाज को सतत् प्रेरणा देने वाले, प्राचीन एवं सार्थक प्रतीक के नाते भगवा ध्वज को गुरु के स्थान पर स्थापित करने का उनका विचार, उनके दूरदृष्टा होने का परिचायक है. व्यक्ति चाहे कितना भी श्रेष्ठ क्यों ना हो, व्यक्ति नहीं, तत्वनिष्ठा पर उनका बल रहता था. इसके कारण ही आज 9 दशक बीतने के बाद भी, सात–सात पीढ़ियों से संघ कार्य चलने के बावजूद संघ कार्य अपने मार्ग से ना भटका, ना बंटा, ना रुका.

संघ संस्थापक होने का अहंकार उनके मन में लेशमात्र भी नहीं था. इसीलिए सरसंघचालक पद का दायित्व सहयोगियों का सामूहिक निर्णय होने कारण 1929  में उसे उन्होंने स्वीकार तो किया, परन्तु 1933 में संघचालक बैठक में उन्होंने अपना मनोगत व्यक्त किया. उसमें उन्होंने कहा –

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जन्मदाता या संस्थापक मैं ना हो कर आप सब हैं, यह मैं भली-भांति जानता हूँ. आप के द्वारा स्थापित संघ का, आपकी इच्छानुसार, मैं एक दाई का कार्य कर रहा हूँ. मैं यह काम आपकी इच्छा एवं आज्ञा के अनुसार आगे भी करता रहूँगा तथा ऐसा करते समय किसी प्रकार के संकट अथवा मानापमान की मैं कतई चिंता नहीं करूँगा. 

आप को जब भी प्रतीत हो कि मेरी अयोग्यता के कारण संघ की क्षति हो रही है, तो आप मेरे स्थान पर दूसरे योग्य व्यक्ति को प्रतिष्ठित करने के लिए स्वतंत्र हैं. आपकी इच्छा एवं आज्ञा से जितनी सहर्षता के साथ मैंने इस पद पर कार्य किया है, इतने ही आनंद से आप द्वारा चुने हुए नए सरसंघचालक के हाथ सभी अधिकार सूत्र समर्पित करके उसी क्षण से उसके विश्वासु स्वयंसेवक के रूप में कार्य करता रहूँगा. मेरे लिए व्यक्तित्व के मायने नहीं है; संघ कार्य का ही वास्तविक अर्थ में महत्व है. अतः संघ के हित में कोई भी कार्य करने में मैं पीछे नहीं हटूंगा”

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार के ये विचार उनकी निर्लेप वृत्ति एवं ध्येय समर्पित व्यक्तित्व का दर्शन कराते है.

सामूहिक गुणों की उपासना तथा सामूहिक अनुशासन, आत्मविलोपी वृत्ति स्वयंसेवकों में निर्माण करने हेतु भारतीय परंपरा में नए ऐसे समान गणवेश, संचलन, सैनिक कवायद, घोष, शिविर आदि कार्यक्रमों को संघ कार्य का अविभाज्य भाग बनाने का अत्याधुनिक विचार भी डॉक्टर जी ने किया. संघ कार्य पर होने वाली आलोचना को अनदेखा कर, उसकी उपेक्षा कर वादविवाद में ना उलझते हुए सभी से आत्मीय सम्बन्ध बनाए रखने का उनका आग्रह रहता था.

“वादो नाSवलम्ब्यः” और  “सर्वेषाम् अविरोधेन” ऐसी उनकी भूमिका रहती थी. प्रशंसा और आलोचना में - दोनों ही स्थिति में डॉ. हेडगेवार अपने लक्ष्य, प्रकृति और तौर तरीकों से तनिक भी नहीं डगमगाते. संघ की प्रशंसा उत्तरदायित्व बढाने वाली प्रेरणा तथा आलोचना को आलोचक की अज्ञानता का प्रतीक मान कर वह अपनी दृढ़ता का परिचय देते रहे.

1936 में नासिक में शंकराचार्य विद्याशंकर भारती द्वारा डॉक्टर हेडगेवार को “राष्ट्र सेनापति” उपाधि से विभूषित किया गया, यह समाचार, समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ. डॉक्टर जी के पास अभिनन्दन पत्र आने लगे. पर उन्होंने स्वयंसेवकों को सूचना जारी करते हुए कहा कि “हम में से कोई भी और कभी भी इस उपाधि का उपयोग ना करे. उपाधि हम लोगों के लिए असंगत है.” उनका चरित्र लिखने वालों को भी डॉक्टर जी ने हतोत्साहित किया. “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें ना रहें” यह परंपरा उन्होंने संघ में निर्माण की.

शब्दों से नहीं, आचरण से सिखाने की उनकी कार्य पद्धति थी. संघ कार्य की प्रसिद्धि की चिंता ना करते हुए, संघ कार्य के परिणाम से ही लोग संघ कार्य को महसूस करेंगे, समझेंगे तथा सहयोग एवं समर्थन देंगे, ऐसा उनका विचार था. “फलानुमेया प्रारम्भः” याने वृक्ष का बीज बोया है इसकी प्रसिद्धि अथवा चर्चा ना करते हुए वृक्ष बड़ा होने पर उसके फलों का जब सब आस्वाद लेंगे तब किसी ने वृक्ष बोया था, यह बात अपने आप लोग जान लेंगे, ऐसी उनकी सोच एवं कार्य पद्धति थी.

इसीलिए उनके निधन होने के पश्चात् भी, अनेक उतार-चढाव संघ के जीवन में आने के बाद भी, राष्ट्र जीवन में अनेक उथल-पुथल होने के बावजूद संघ कार्य अपनी नियत दिशा में, निश्चित गति से लगातार बढ़ता हुआ अपने प्रभाव से सम्पूर्ण समाज को स्पर्श और आलोकित करता हुआ आगे ही बढ़ रहा है. संघ की इस यशोगाथा में ही डॉक्टर जी के समर्पित, युगदृष्टा, सफल संगठक और सार्थक जीवन की यशोगाथा है.

Comments

Popular posts from this blog

વીજ ટાવર-લાઈનના જમીન વળતરમાં વધારો:હવે ખેડૂતોને બજારભાવના બમણા દરે મળશે સહાય, જંત્રી આધારિત વળતરનો અંત, રાજ્ય સરકારનો નિર્ણય

 ખેડૂતોના વિરોધ સામે સરકાર ઝૂકી રાજ્યમાં ખેડૂતો છેલ્લા ઘણા સમયથી ખેતરોમાંથી પસાર થતાં વીજ ટાવર લાઈનના યોગ્ય વળતરને લઈને સતત રજૂઆત અને વિરોધ નોંધાવી રહ્યા હતા. તેવામાં ખેડૂતોના વિરોધ સામે હવે સરકાર ઝૂકી છે. આ મામલે રાજ્ય સરકારના પ્રવક્તા મંત્રીએ જણાવ્યું હતું કે, 'વીજ પોલમાં હવે જંત્રીને બદલે જમીનના વર્તમાન બજારભાવના બમણા દરે ખેડૂતોને વળતર ચૂકવવાનો નિર્ણય લેવાયો છે. આ ભાવ નક્કી કરવા માટે માર્કેટ રેટ કમિટીની રચના કરાશે. જેમાં અસરગ્રસ્ત ખેડૂતોના પ્રતિનિધિ, કંપનીના પ્રતિનિધિ, જિલ્લા કલેકટર સહિતના વ્યક્તિનો કમિટીમાં સમાવેશ કરાશે.' જંત્રીને બદલે બજાર ભાવના બમણા દરે વળતર આપવાની વાત ગુજરાત સરકારે વીજ ટાવર અને લાઇન પસાર થવા બદલ ખેડૂતોને અપાતા વળતરમાં વધારો કરવાની જાહેરાત તો કરી છે, પરંતુ આ નિર્ણય પાછળ ખેડૂત સંગઠનોના લાંબા સમયના આક્રોશ અને આગામી રાજકીય ગણતરીઓ છુપાયેલી હોવાની ચર્ચાઓએ જોર પકડ્યું છે. જંત્રીને બદલે બજાર ભાવના બમણા દરે વળતર આપવાની વાત પ્રથમ દ્રષ્ટિએ આકર્ષક લાગે છે, પરંતુ વાસ્તવમાં આ નિર્ણય સરકારે પોતાની અગાઉની અન્યાયી નીતિઓનો સ્વીકાર કર્યો હોવાનું સાબિત કરે છે. વર્ષોથી જંત્ર...

JMC સંચાલિત જામનગર જનમાર્ગ ફાઉન્ડેશન દ્વારા ઈલેક્ટ્રિક સિટી બસ સેવા શરૂ કરી છે

  The Jamnagar Janmarg Foundation (JJMF) operates the city bus service in Jamnagar in partnership with the Jamnagar Municipal Corporation. The service includes a modernized fleet of electric buses aimed at providing eco-friendly and convenient public transportation across the city. Operating Hours: Buses generally run from 06:30 AM to 09:30 PM, with specific frequencies varying between 60 to 90 minutes depending on the route. બસના રૂટ,સમયપત્રક માટે ડાઉનલોડ કરો. Official App: You can easily track real-time bus locations, check route timetables, and purchase tickets directly through the JJMF – Apps on Google Play mobile app. PM E Bus service  JMC સંચાલિત જામનગર જનમાર્ગ ફાઉન્ડેશન દ્વારા ઈલેક્ટ્રિક સિટી બસ સેવા શરૂ કરી છે.બસના રૂટ,સમયપત્રક માટે ડાઉનલોડ કરો. Android: https://shorturl.at/wbJTF IOS: https://shorturl.at/DyMKn   Jamnagar Municipal Corporation

Kakanmath Temple ककनमठ मंदिर

 મધ્યપ્રદેશના મોરેના (Morena) જિલ્લામાં સિહોનિયા ગામ નજીક આવેલું **કકનમઠ મંદિર (Kakanmath Temple)** ભારતનાં સૌથી રહસ્યમય, ભયાનક અને અદભુત મંદિરોમાંનું એક છે. આ મંદિરને જોતાં જ એવું લાગે છે કે તે હમણાં જ પડી જશે, પરંતુ તે સદીઓથી તમામ વાવાઝોડાં અને ભૂકંપો સામે અડીખમ ઊભું છે. નીચે આ રહસ્યમય મંદિરનો ઇતિહાસ અને તેની વિગતો આપવામાં આવી છે: 1. કકનમઠ મંદિરનો ઇતિહાસ (History)  નિર્માણ કાળ:આ મંદિરનું નિર્માણ 11મી સદીમાં (આશરે ઇ.સ. 1015 થી 1035 દરમિયાન) થયું હતું.  શાસક:કછવાહા (Kachchhapaghata) રાજવંશના રાજા **કીર્તિરાજ** દ્વારા આ મંદિરનું નિર્માણ કરાવવામાં આવ્યું હતું.  * **નામકરણ:** રાજા કીર્તિરાજની રાણીનું નામ **'કકનવતી'** હતું, જેઓ ભગવાન શિવના પરમ ભક્ત હતા. રાણીની ઈચ્છા પૂરી કરવા માટે રાજાએ આ મંદિર બંધાવ્યું હતું, તેથી રાણીના નામ પરથી આ મંદિરનું નામ 'કકનમઠ' પડ્યું.  * **દેવતા:** આ મંદિર ભગવાન શિવને સમર્પિત છે અને તેના ગર્ભગૃહમાં આજે પણ એક મોટું શિવલિંગ સ્થાપિત છે. 2. અદભુત સ્થાપત્ય અને રહસ્ય (The Architectural Mystery) કકનમઠ મંદિર તેની અનોખી બનાવટ અને રહસ્યમય ભૌમિતિક સં...

New Traffic Rules : 1 જ વર્ષમાં 5 E Challan આવશે તો ડ્રાઇવિંગ લાઇસન્સ થશે સસ્પેન્ડ, કેન્દ્ર સરકારનો નવો નિયમ

 Traffic Rules Change: ભારત સરકારના (Government of India) રોડ ટ્રાન્સપોર્ટ અને હાઈવે મંત્રાલય (Ministry of Road Transport and Highways) દ્વારા કેન્દ્રીય મોટર વાહન નિયમોમાં (Central Motor Vehicles Rules) અત્યંત મહત્વપૂર્ણ અને કડક સુધારા કરવામાં આવ્યા છે. આ નવા કાયદાકીય ફેરફારો અનુસાર, ઈ-ચલણ (E-Challan) અંગે વાહનચાલકો અને માલિકો માટે ફરિયાદ નિવારણ, દંડની રકમ ભરપાઈ કરવાની મુદત તેમજ ડ્રાઇવિંગ લાઇસન્સ (Driving Licence) સસ્પેન્શન અંગેની જોગવાઈઓ હવે પહેલાં કરતાં વધુ કડક અને ચુસ્ત બનાવી દેવામાં આવી છે. ગુજરાત સરકારના (Government of Gujarat) વાહનવ્યવહાર વિભાગ દ્વારા પણ રાજ્યના નાગરિકોને આ નિયમોનું ચુસ્તપણે પાલન કરવા અને બાકી ઈ-ચલણ સમયસર ભરી દેવા માટે ખાસ અનુરોધ કરવામાં આવ્યો છે. ફરિયાદ માટે 45 દિવસની સમયમર્યાદા અને આપોઆપ સ્વીકૃતિ નવા નિયમોની મુખ્ય વિગતો અનુસાર, જો કોઈ પણ વાહનચાલક કે માલિકને ઈશ્યુ થયેલા ઈ-ચલણ (E-Challan) સામે કોઈ વાંધો, ટેકનિકલ ભૂલ કે રજૂઆત હોય, તો ચલણ જનરેટ થયાની તારીખથી 45 દિવસની સમયમર્યાદામાં સત્તાવાર 'ઈ-ચલણ પોર્ટલ' પર ઓનલાઈન ફરિયાદ દાખલ કરવાની રહેશે. જો આ 45 દિવસમાં ...

એકતા • સેવા • સમર્પણ : સમાજ પ્રત્યેની આપણી જવાબદારી શું છે,

 આ પંક્તિઓ ખૂબ જ ઊંડી, પ્રેરણાદાયી અને સમાજ માટે અરીસો બતાવનારી છે. ​સમાજ પ્રત્યેની આપણી જવાબદારી શું છે, તે આ ચાર લીટીઓમાં ખૂબ જ સુંદર રીતે સમજાવવામાં આવ્યું છે: ​લડો સમાજ માટે: જો તમારામાં અન્યાય સામે લડવાની તાકાત હોય, તો આગળ આવીને લડો. ​લડી ના શકો તો બોલો: જો કોઈ કારણસર મેદાનમાં આવીને લડી ન શકો, તો અન્યાય સામે અવાજ ઉઠાવો, તમારો વિરોધ નોંધાવો. ​બોલી ના શકો તો લખો: જો અવાજ ઉઠાવવામાં પણ સંકોચ કે ડર હોય, તો તમારી કલમ ઉપાડો. લખાણ પણ મોટું પરિવર્તન લાવી શકે છે. ​હિંમત ના તોડો: અને જો તમે આ ત્રણેય વસ્તુ કરવા સક્ષમ નથી, તો કંઈ નહીં... પણ જે લોકો સમાજ સુધારવા માટે લડી રહ્યા છે, બોલી રહ્યા છે કે લખી રહ્યા છે, તેમની હિંમત ક્યારેય ન તોડો. તેમનો પગ ખેંચવાને બદલે તેમને સાથ આપો અથવા મૌન રહીને પણ તેમનું મનોબળ વધારો. ​એકતા, સેવા અને સમર્પણની ભાવના સાથેનો આ સંદેશ ખરેખર દરેક વ્યક્તિએ પોતાના જીવનમાં ઉતારવા જેવો છે. ખૂબ જ સુંદર વિચાર!

જ્યારે મહમૂદ ગઝનવીએ શ્રી કૃષ્ણનું જન્મસ્થળ તોડી નાખ્યું હતું,

 ગુજરાતના પ્રખ્યાત સોમનાથ મંદિરની જેમ, મથુરાના શ્રી કૃષ્ણ જન્મસ્થળ પર પણ આક્રમણકારી મહેમૂદ ગઝનવીએ હુમલો કર્યો હતો. આ મંદિરને પણ લૂંટી લીધું હતું. આ મંદિર ત્રણ વખત તૂટી ગયું છે અને ચાર વખત નિર્માણ થયું છે. હજી પણ આ સ્થળની માલિકી માટે બે પક્ષોમાં કોર્ટમાં વિવાદ ચાલી રહ્યો છે. જાણો કૃષ્ણ જન્માષ્ટમી પર જન્મ ઇતિહાસ… કૃષ્ણનો જ્યાં જન્મ થયો છે, તે પાંચ હજાર વર્ષ પહેલાં મલ્લપુરા ક્ષેત્રના કટરા કેશવ દેવમાં રાજા કામસાની જેલ હતો. ભગવાન શ્રીકૃષ્ણનો જન્મ આ જેલમાં રોહિણી નક્ષત્રમાં મધ્યરાત્રિએ થયો હતો. ઇતિહાસકાર ડો. વાસુદેવ શરણ અગ્રવાલે કટરા કેશવદેવને કૃષ્ણનું જન્મસ્થળ માન્યું છે. વિવિધ અધ્યયન અને પુરાવાઓના આધારે, મથુરાના રાજકીય સંગ્રહાલયના બીજા કૃષ્ણદત્ત વાજપેયીએ પણ સ્વીકાર્યું કે કટરા કેશવદેવ એ કૃષ્ણનું સાચું જન્મસ્થળ છે. ઇતિહાસકારોના મતે, સમ્રાટ ચંદ્રગુપ્ત વિક્રમાદિત્ય દ્વારા બાંધવામાં આવેલા આ ભવ્ય મંદિર પર 1017 એ.ડી.માં મહેમૂદ ગઝનવીએ હુમલો કર્યો હતો અને લૂંટ ચલાવ્યા બાદ તૂટી પડ્યો હતો. કૃષ્ણના મહાન પૌત્ર બજરનાભે પહેલું મંદિર બનાવ્યું : લોકપ્રિય માન્યતા અનુસાર, જેલની નજીકની પ્રથમ ...

Mamallapuram, Tamil Nadu

 તામિલનાડુમાં ચેન્નાઈથી લગભગ 60 કિમી દૂર બંગાળની ખાડીના કિનારે આવેલું મામલ્લાપુરમ (જે મહાબલીપુરમ તરીકે પણ ઓળખાય છે) તેના અદભુત દરિયાકાંઠાના મંદિરો, પથ્થરોમાંથી કોતરેલી ગુફાઓ અને પલ્લવ રાજવંશના સ્થાપત્ય માટે વિશ્વભરમાં પ્રખ્યાત છે. ​ઇલોરાના કૈલાશ મંદિરની જેમ જ, આ સ્થળ પણ પ્રાચીન ભારતીય શિલ્પકળાનો સુવર્ણ ઇતિહાસ દર્શાવે છે. અહીં મામલ્લાપુરમનો ઇતિહાસ અને તેની મુખ્ય વિશેષતાઓ વિગતે આપવામાં આવી છે: ​1. મામલ્લાપુરમનો ઇતિહાસ (History) ​નિર્માણ કાળ: આ ઐતિહાસિક નગર અને તેના મંદિરોનું નિર્માણ 7મી અને 8મી સદી દરમિયાન થયું હતું. ​શાસક: આ સ્થાપત્યોનું નિર્માણ દક્ષિણ ભારતના શક્તિશાળી પલ્લવ રાજવંશ (Pallava Dynasty) ના રાજાઓ દ્વારા કરવામાં આવ્યું હતું. ખાસ કરીને રાજા નરસિંહવર્મન પ્રથમ (જેઓ પોતાની યુદ્ધકળાના કારણે 'મામલ્લ' એટલે કે મહાન યોદ્ધા તરીકે ઓળખાતા) અને રાજા નરસિંહવર્મન દ્વિતીય (રાજસિંહ) ના સમયમાં આ કાર્ય થયું. ​મહત્વ: પલ્લવ શાસન દરમિયાન મામલ્લાપુરમ એક વ્યસ્ત અને સમૃદ્ધ બંદર (Port City) હતું, જ્યાંથી દક્ષિણ-પૂર્વ એશિયાના દેશો સાથે વેપાર થતો હતો. ​2. મુખ્ય જોવાલાયક સ્થળો અને સ્થાપત્ય ​મામલ્...

રામાયણની થીમ પર રાજકોટમાં 'રામવન' લઇ રહ્યું છે આકાર

રામાયણની થીમ પર રાજકોટમાં 'રામવન' લઇ રહ્યું છે આકાર, 98 % કામ પૂર્ણ, જન્માષ્ટમી પહેલા લોકો માટે ખુલ્લું મુકાઇ તેવી શક્યતા....... આ રામવન ખાતે ભગવાન શ્રીરામના જુદા જુદા પ્રસંગો દર્શાવતાં 22 જેટલાં સ્કલ્પ્ચર પણ મૂકવામાં આવશે અને ભગવાન શ્રીરામે કરેલો વનવાસ અર્બન ફોરેસ્ટમાં આકાર લઇ વિકસાવવામાં આવશે. 55 હજાર વૃક્ષથી ઘેઘૂર જંગલ બની રહ્યું છે. રાજકોટના લોકોને અર્બન ફોરેસ્ટની ભેટ મળશે આ અંગે રાજકોટ મહાનગપાલિકાના ગાર્ડન શાખાના અધિકારી કે.પી. હાપલિયાએ જણાવ્યું હતું કે રાજકોટના આજીડેમ પાસે નિર્માણ થઇ રહેલા રામવનનું દિવાળી બાદ મોટા ભાગનું કામ પૂર્ણ થઇ જશે, જેથી આગામી માર્ચ મહિનામાં રાજકોટના લોકોને અર્બન ફોરેસ્ટની ભેટ મળી જાય એ પ્રકારે આયોજન કરવામાં આવી રહ્યું છે. આ મિની જંગલને તંત્ર દ્વારા રામવન નામ આપવામાં આવ્યું છે, જેનું 60 ટકા જેટલું કામ પૂરું થઇ ગયું છે. રામવન ખાતે વિવિધ કામગીરી અને નવાગામ સી.સી. રોડની ચાલુ કામગીરી નિહાળતા મ્યુનિ. કમિશનરશ્રી @arora2k21 : જુદાજુદા કામે નિમાયેલ એજન્સી સાથે કામગીરી અંગે મ્યુનિ. કમિશનરશ્રીએ રીવ્યુ બેઠક કરી: ચોમાસા પહેલા તાત્કાલિક કામગીરી પૂર્ણ કરવા સુચ...

जिस बुजुर्ग को मामूली समझकर टिकट फाड़़ दी गई. उसी ने एक कॉल मेंपूरी एयरलाइंस बंद करवा दी ।

 सर्दियों की सुबह थी। दिल्ली एयरपोर्ट की भीड़ अपने चरम पर थी। बिजनेस ट्रैवलर्स लैपटॉप लेकर भाग रहे थे। परिवार छुट्टियों पर जाने को तैयार थे और हर तरफ चकाचौंध थी। इसी भीड़ में एक बुजुर्ग व्यक्ति धीरे-धीरे चलते हुए एयरलाइंस के काउंटर तक पहुंचे। उनका पहनावा सादा था। सफेद कुर्ता पाजामा, ऊपर एक पुराना भूरे रंग का स्वेटर, और पैरों में फटी सी चप्पल। हाथ में एक प्लास्टिक कवर में रखी हुई प्रिंटेड टिकट थी। शायद कहीं से किसी ने निकाल कर दी हो। उनके चेहरे पर शांति थी। लेकिन आंखों में एक थकान भी जैसे कोई लंबा सफर तय करके आया हो। और अब केवल कंफर्म सीट का आश्वासन चाहिए। उन्होंने काउंटर पर खड़ी लड़की से बड़े विनम्र स्वर में पूछा। बिटिया यह मेरी टिकट है। सीट कंफर्म है क्या? मुझे जयपुर जाना है। लड़की ने एक नजर उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। फिर मुंह बनाया और बोली, "अंकल, यह रेलवे स्टेशन नहीं है। यहां बोर्डिंग ऐसे नहीं मिलती। पहले ऑनलाइन चेक इन करना पड़ता है। बुजुर्ग थोड़ा घबरा गए। मुझे नहीं आता बेटा। यह सब बस आप एक बार देख लो। प्लीज। मेरी बहू अस्पताल में है। पास खड़ा एक और कर्मचारी हंसते हुए बोला। अरे...

નારાયણ સરોવર

નારાયણ સરોવર હિંદુઓના પવિત્ર યાત્રાધામો પૈકીનું એક છે. શ્રીમદ્ ભાગવતમ્ માં વર્ણવેલા પાંચ પવિત્ર સરોવરોના જૂથને ‘પંચ સરોવર’ કહેવાય છે.  તે પાંચ સરોવર છે માન સરોવર, બિંદુ સરોવર, નારાયણ સરોવર, પંપા સરોવર અને પુષ્કર સરોવર. તેમનુ આ એક સરોવર છે નારાયણ સરોવરનો અર્થ થાય છે ભગવાન શ્રી વિષ્ણુનું સરોવર. પૌરાણીક કથાઓ અનુસાર સરસ્વતી નદી નારાયણ સરોવર નજીક આવેલા દરિયામાં મળતી હતી અને આ સરોવરને પોતાના પાણી વડે ભરી દેતી. આથી આ સ્થળને હિંદુઓ દ્વારા પવિત્ર ગણવામાં આવે છે. આ સ્થળે વૈષ્ણવ સંપ્રદાયના શ્રી ત્રિકમજી, લક્ષ્મીનારાયણ, ગોવર્ધનનાથજી, દ્વારકાનાથ, આદિનારાયણ, રણછોડરાયજી અને લક્ષ્મીજીના મંદિરો આવેલા છે. રાવ દેશળજી ત્રીજાના રાણીએ આ મંદિરો બંધાવ્યાં છે. સમગ્ર ભારતમાંથી શ્રદ્ધાળુઓ અહીં દર્શનાર્થે આવે છે. તળાવની વાસ્તુકળા પ્રાચીન અને સુંદર છે. લક્ષ્મીનારાયણ અને ત્રિકમરાયના મંદિરોને દ્વારકા મંદિર જેવી શૈલિથી જ બનાવાયા છે.  બાકીના પાંચ મંદિરો ૧૭૮૦-૯૦માં વાઘેલી મહાકુંવર નામના રાવ દેશળજીના રાણી દ્વારા બનાવાયા છે. અને તે પછી કલ્યાણરાયનું મંદિર બંધાવાયું. મહાપ્રભુ વલ્લભાચાર્ય તેમના જીવન કાળ દરમ્યાન અહી...